भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से पिता को केवल 'कमाने वाला' माना जाता था, लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है। आधुनिक भारतीय पिता, विशेषकर युवा पुरुष, अब बच्चों के पालन-पोषण में केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने और उनके दैनिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
पिताओं की बढ़ती भागीदारी
हालिया रिपोर्टों और विशेषज्ञों के अनुसार, आज के युवा पिता बच्चों के डायपर बदलने से लेकर उन्हें स्कूल छोड़ने और उनके साथ खेलने तक में समय बिता रहे हैं। वे अब 'मददगार' के बजाय एक 'समान भागीदार' के रूप में खुद को देख रहे हैं। यह बदलाव कामकाजी माताओं के लिए भी एक बड़ा सहारा बनकर उभरा है।
क्या है 'डैड गिल्ट' (Dad Guilt)?
इस सक्रिय भागीदारी के साथ-साथ अब पुरुषों में भी 'गिल्ट' यानी अपराधबोध की भावना देखी जा रही है, जो पहले अक्सर केवल माताओं में पाई जाती थी। काम के दबाव के कारण बच्चों को पर्याप्त समय न दे पाना या उनके किसी खास पल (जैसे स्कूल फंक्शन) में शामिल न हो पाने पर पिता अब मानसिक तनाव और पछतावा महसूस करते हैं।
बदलाव के कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं:
- परमाणु परिवार (Nuclear Families): संयुक्त परिवारों के टूटने के कारण अब माता-पिता को मिलकर ही सारी जिम्मेदारियां उठानी पड़ती हैं।
- जागरूकता: युवा पीढ़ी अब मानसिक स्वास्थ्य और बच्चों के साथ भावनात्मक जुड़ाव के महत्व को समझती है।
- कार्य संस्कृति: कई कंपनियाँ अब 'पैटर्निटी लीव' (पितृत्व अवकाश) और लचीले काम के घंटे प्रदान कर रही हैं, जिससे पिताओं को घर पर समय बिताने का मौका मिल रहा है।
निष्कर्ष
समाज में आ रहा यह बदलाव बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए बेहद सकारात्मक है। हालांकि, विशेषज्ञों की सलाह है कि पिताओं को 'परफेक्ट' बनने के दबाव में खुद पर मानसिक बोझ नहीं डालना चाहिए, बल्कि गुणवत्तापूर्ण समय (Quality Time) बिताने पर ध्यान देना चाहिए।